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Saturday, January 30, 2010

जिजीविषा

मेरी खिड़की के झरोखे से इक सूखी टहनी दिखती है,

सर्द हवा के झोकों से अकेली जूझती हुई।

कभी बर्फ़ की चादर अोढ़े, कभी ठंडी धूप में ठिठुरते हुए,

कहीं उसे खुद पर दया तो न अाती होगी?

अब तो कमबख्त पत्तों ने भी साथ छोड़ दिया है।

उस ठंडी निर्दय आंधी में कहीं वो सहम तो न जाती होगी?


पर हफ़्तों से देखता हूँ, हार तो नहीं मानी इसने।

जहाँ कई शाखें धराशायी हैं, ये ज्यौं की तयौं डटी है।

टहनी छोटी ही सही, जीवट तो बहुत है!

इतना साहस, इतनी जीवनशक्ति, कहाँ से पाती होगी!


तभी ये बातें हवा ने बाहर जा फुसफुसा दीं।

टहनी मेरी ओर झुक कर, कुछ मुस्कुराकर बोली -

तुम मनुष्य जिजीविषा का अनोखा मतलब लगाते हो!

जीवन को युद्ध मान कर, मुझ पर बेवजह तरस खाते हो।

मैं तो बस ठंडी हवा का आनंद उठाती हूँ।

तब पत्तों के साथ झूमती थी, अब अकेली लहराती हूँ!


Monday, June 02, 2008

एक और

हवा में नाचते बगीचे में
कहीं एक फूल टूट कर गिर गया।
टहनियों ने शायद कुछ देर निहारा होगा,
कहा होगा बेचारा अधखिला ही रह गया।
फिर वापस हवा से बातें करने लगीं होंगी,
भूल कर उसे जो अब बोल नहीं सकता।
बाग़ में हर ओर कई फूल सजे हैं।
रंगों की इस भीड़ के बीच कहीं,
एक और सुगंध, एक और उमंग,
खिलने से पहले ही घुट कर दम तोड़ गई।

Saturday, October 07, 2006

सवाल

पूछती है राह मुझसे,
यूॅ बढ़ा किस ओर चला है?
दूर तक फैला है बियाबॉ,
नापने कौनसा तू छोर चला है?

खेला करती ये मुझसे अक्सर,
दोराहों पर लाकर मुझे|
राह ही सवाल है, है यही जवाब भी,
मैं इसे बूझता हूॅ, या ये बूझती मुझे?

दूर तक दिखती लम्बी राह,
कभी अचानक पगडंडियों पे मुड़ जाया करती है|
किसी छोटे से गॉव में मुझे लाकर,
उसी में गुम जाया करती है|

पूछती है मुझसे मानो,
सोच ले क्या यहीं रुकेगा?
क्या यही पाने चला था,
या कुछ दूर और चलेगा?

चल रहा हूॅ संग उसीके,
रास्ता साथी मेरा है|
चाह है देखूॅ कि आगे,
किस मोड़ पर छिपा क्या है?

Saturday, April 22, 2006

G-Drive

Side effects of prolonged boredom a.k.a. computer architecture:

बेवजह देखता तू आसमॉं को क्यों खड़ा है?
सुबह हो जाए कल शायद, पर अॅंधेरा भी क्या बुरा है!

दिये मैं लौ अगर है बाकी तो अभी रात कहॉ,
जो मज़ा चलने में है, रुक जाने में वो बात कहॉं!